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Monday, April 16, 2012

युवा कांग्रेस और NSUI में चुनाव: बदलाव बेहतर होगा



नोट: मैं अतुल सिंघानिया का आभारी हूँ जिन्होंने इस लेख का हिंदी अनुवाद किया है. 

उत्तर प्रदेश और पंजाब में हुए विधानसभा चुनावों के पश्चात, बहुत लोगों ने NSUI और युवा कांग्रेस के पदों के लिए कराये जा रहे चुनावों की उपयोगिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. लोगों का मत है कि इन संस्थाओं में चुनाव तीन कारणों से उपयोगी नहीं रहे हैं -

 i. चुनाव अपनी ही पार्टी के लोगों में आपसी वैमनस्यता बढ़ा कर कटुता पैदा करते हैं. 
ii. जीते हुए प्रत्याशी को किसी को भी पुरस्कृत या दण्डित करने का कोई अधिकार नहीं होता. इस वजह से उनकी कोई नहीं सुनता. सर्वोच्च अधिकार मुख्य रूप से नियुक्त की गयी केन्द्रीय कमिटी के पास होता है. 
iii. चुनाव चयनित पदाधिकारियों के मन में महत्वाकांक्षाएं बढ़ा देते हैं: उन्हें ऐसा लगने लगता है कि चुनाव जीत जाने से उन्हें आम चुनाव में पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ने का अधिकार मिल जाता है. ये महान महत्वाकांक्षाएं बहुत ही कम पूरी होती हैं.

मैं चुनाव करवाने के पूरी तरह से पक्ष में हूँ. महान विंस्टन चर्चिल के शब्दों में व्याख्या करें तो "चुनाव करवाना युवा कांग्रेस को चलाने के अन्य सभी अजमाए हुए तरीकों से कम ख़राब विकल्प है." सबसे उपयुक्त व्यक्तियों को चुनने के लिए इससे बेहतर कोई भी तरीका नहीं हो सकता. मेरा मत है कि इस प्रकिया में गलती यह है कि चुनाव अपने आप में चयनित पदाधिकारियों को अधिकार नहीं देते. इसके विपरीत चुनाव यह सुनिश्चित करते हैं कि चुने हुए पदाधिकारी आपस में एक दूसरे के प्रति पहले ही दिन से गहरा अविश्वास करते हैं: या तो वे एक दूसरे के विरोध में काम करते हैं या काम ही नहीं करते.

हमारे सिस्टम में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे कि प्रत्याशियों में चुनाव के बाद वापस रिश्ते सामान्य हों. रिश्ते सामान्य होने से मेरा मतलब यह नहीं है कि उन लोगों के बीच फिर से स्नेह और प्यार बहाल हो जाए. जो प्रक्रिया जीत और पराजय निश्चित करवाती है, उससे यह अपेक्षा रखना कुछ ज्यादा ही हो जाएगा. लेकिन रिश्ते बहाली से यह जरुर अपेक्षा की जा सकती है कि एक अच्छा "कामकाजी सम्बन्ध" बनाया जाए जो पार्टी के हित में हो. यह तभी संभव है जब हम उस पदानुक्रम को स्वीकार करें जो चुनाव की वजह से उत्पन्न होता है.

चुनाव द्वारा हमारे युवा नेताओं को चुनना यदि सबसे उपयुक्त तरीका न भी हो तब भी निसंदेह ही सबसे कम बुराइयों वाला तरीका है. लेकिन इसमें दिक्कत जो मुझे समझ में आती है वह यह है कि चुने हुए लोगों को जवाबदारी तो पूरी सौंप दी जाती है लेकिन उन जवाबदारियों को निभाने के लिए कोई भी अधिकार नहीं दिए जाते. कोई भी प्रबंधन का छात्र यह भली भांति जानता होगा कि यह तरीका बर्बादी की राह पर ले जाता है. वर्तमान व्ययस्था में चुने हुए लोगों से अधिकार लेकर अचयनित और नियुक्त की गयी केन्द्रीय कमिटी के हाथों में दे दिए जाते हैं.

इस समस्या को दो तरह से सुलझाया जा सकता है:
i. केंद्रीय कमिटी जो सबसे ऊपर रहती है उसके भी चुनाव करवाए जाएँ.
ii. राज्य से लेकर पंचायत स्तर तक हर जगह चुने हुए कमिटी के मुखिया को यह अधिकार दिए जाएँ कि वे अपने साथ काम करने वाले सदस्यों की नियुक्ति कर सकें और उन्हें अनुशाशन में रख सकें. मुखिया को यह बुनियादी अधिकार दिए बिना अनुशासनहीनता की समस्या जस की तस बनी रहेगी. कमिटी के अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने हिसाब से कम से कम पांच सचिवों की नियुक्ति कर सके (बशर्ते वे कुछ तय किये गए मापदंडों में खरे उतरते हो) और कमिटी के बाकी चुने हुए सदस्यों पर अध्यक्ष जरुरत पड़ने पर अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सके (जो कि एक खुली प्रक्रिया के तहत हो और जिसमे सदस्य के पास अपील का अधिकार हो).

जहाँ तक विजयी प्रत्याशियों में बढ़ी हुई महत्वकांक्षा का सवाल है, यह काफी स्वाभाविक है. लेकिन संगठनात्मक चुनाव में विजय प्रत्याशी को आम चुनाव में पार्टी टिकेट का न तो हकदार बना सकती है और न ही बनाना चाहिए. उसके प्रदर्शन का मूल्याँकन करने के लिए विषयनिष्ठ पैमाने तय किये जाने चाहिए"पहचान" केवल सैद्धांतिक प्रतिरूप बनकर नहीं रह जाना चाहिए: इसका सीधा सम्बन्ध टिकट आबंटन से होनी चाहिए. दुर्भाग्यवश इन चुने हुए पदाधिकारियों को कोई अधिकार न देना- और उन्हें ऐसे लोगों के प्रति उत्तरदायी बनाना जो खुद चयन से न आकर नियुक्ति प्रक्रिया से आये हैं- पदाधिकारियों को अपनी पूरी क्षमता से काम करने से मुश्किल कर देता है. मुझे विश्वास है कि पदाधिकारियों को अधिकार मिलने के बाद उनका प्रदर्शन बहुत हद तक सुधरेगा. और सब कुछ ठीक तरह चलने से वे लोग समय के साथ पार्टी टिकट के स्वाभाविक दावेदार होंगे. उन्हें बस संयम बरतना और सही समय का इंतज़ार करना सीखना होगा.

जहाँ तक चुनाव के समय का सवाल है, उत्तरप्रदेश, पंजाब, झारखण्ड और बिहार ने हमे यह सिखाया है कि सबसे उपयुक्त होगा अगर NSUI और युवा कांग्रेस के संगठन के चुनाव विधान सभा चुनाव या आम चुनाव के कम से कम दो साल पहले करवाए जाएँ. इससे सम्बंधित राज्य कमिटी या केंद्रीय कमिटी को काम करने के लिए उनके तय कार्यकाल की पूरी अवधि मिलेगी. इसका फ़ायदा यह भी होगा कि संगठनात्मक चुनाव के दौरान उत्त्पन्न हुई कटुता को नरम पड़ने के लिए समय मिल जाएगा और चयनित कमिटियों को अपनी उपयोगिता साबित करने का पूरा अवसर मिलेगा.

युवा कांग्रेस के चुनाव की पद्धति में लगातार फेरबदल हुए हैं:
i. पहले विधानसभा कमिटियों के लिए सीधे चुनाव होते थे, उसे बदल कर पंचायतों और वार्डों के डेलीगेट को अपना विधानसभा अध्यक्ष चुनने का अधिकार दिया गया (जिससे कि युवा कांग्रेस सदस्यता अभियान ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँच सके).
ii. पहले पंचायत स्तर के डेलीगेट विधानसभा और लोकसभा कमिटी चुनते थे, और यह कमिटियाँ फिर राज्य की कमिटी चुनती थी (चरणबद्ध तरीके से मतदान). इसे बदल कर एक ही चरण में मतदाताओं द्वारा एक साथ विधान सभा, लोक सभा और राज्य की कमिटियों की चुनाव प्रक्रिया निर्धारित करी गयी. ऐसा इसलिए किया गया जिससे कि डेलीगेट की खरीद फरोक्त को जहाँ तक संभव हो रोका जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि जिस प्रत्याशी का सबसे ज्यादा प्रभाव और संजाल है वह चुनाव जीते.
iii. सबसे ताजे बदलाव में पंचायतों और वार्डों की जगह मतदान बूथों को मूलभूत निर्वाचक इकाई बनाया गया है (जिससे कि संगठनात्मक चुनावों को आम चुनाव की पद्धति पर लाया जा सके और बेहतर बूथ स्तर का प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके).

परिवर्तन- मौजूदा प्रक्रिया की कमी को पहचानना और उसमे सुधार करना- हमारी सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन अभी तक सारे परिवर्तन चुनाव करवाने की प्रक्रिया तक ही सीमित रहे हैं. समय आ गया है कि परिवर्तन के सिद्धांत को चुनी हुई कमिटियों की कार्यप्रणाली पर लागू किया जाए. और जो संस्था इन परिवर्तनों को लागू करती है उसमे भी परिवर्तन किया जाए. इसमें कोई संदेह नहीं कि फेम एक बहुत ही इज्ज़तदार संस्था है लेकिन वह पूरी तरह से गैर राजनितिक है. इस वजह से कई बार राजनैतिक कारणों को पूरी तरह से नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है. हाल ही में फेम द्वारा उठाये गए कदमो पर मनमानी और गुपचुप तरीके से बिना पारदर्शिता के काम करने के आरोप लगे हैं. (उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक युवा कांग्रेस के चुनाव में विजयी प्रत्याक्षी को अयोग्य घोषित करना और पुनः चुनाव करवाने के पीछे जो आधार दिया गया था, उसे फेम द्वारा छत्तीसगढ़ में पिछले NSUI चुनावों के दौरान पूरी तरह से नज़र अंदाज़ कर दिया गया.)

इसका कारण जो मुझे समझ में आता है वह यह है कि चुनाव आयोग जो भारत में आम चुनाव करवाता है उसके सारे निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं लेकिन फेम द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय को न्यायिक समीक्षा की परिधि से बहार रखा गया है. ऐसा करने के पीछे मुख्य कारण यह है कि न्यायिक समीक्षा से पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता फ़ैल सकती है. यदि पार्टी इस नियम को हटा दे तो मुझे विश्वास है कि फेम पर यह आरोप लगने कम हो जायेंगे. मुझे यह भी विश्वास है कि फेम को पार्टी द्वारा ऐसा करने में कोई भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक राजनैतिक संस्था हैं जिसका मुख्य उद्देश्य चुनाव जीतना है.  इसलिए सर्वोच्च संस्था द्वारा लिए गए सभी निर्णय राजनैतिक होने चाहिए. एक पूरी तरह से गैर-राजनैतिक संस्था- जो हो सकता है कि हमारी विचारधारा से सहमत न हो और हमारे राजनैतिक हितों से भी मेल न खाती हो- के हाथों में स्वयं को पूरी तरह से और निशर्त सौंप देना कहीं न कहीं अपने राजनैतिक चरित्र के साथ समझौता करना है. फेम के पास नियमो को लागू करने का सर्वोच्च अधिकार होना चाहिए लेकिन उन नियमों को बनाने का, उनमे बदलाव करने का और नियम को हटाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ एक ऐसी हस्ती को होना चाहिए जो पूर्ण रूप से हमारी विचारधारा के प्रति समर्पित हो और पार्टी हित ही जिसका एकमात्र उद्देश्य हो.

अंततः मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं एक क्षण के लिए भी यह नहीं कह रहा कि मेरे द्वारा यहाँ दिए गए सुझावों का आँख मूँद कर अनुसरण किया जाए. मैं सिर्फ यह उम्मीद कर सकता हूँ कि इस लेख में मेरे द्वारा उठाये गए मुद्दे कांग्रेस पार्टी के युवाओं के लिए विस्तृतसंवाद के शुरवाती बिंदु बनें. ऐसे समय में, जब बेंजामिन फ्रैंकलिन के शब्दों में "हम सब को एक ही बंधन में रहना चाहिए अन्यथा निश्चित रूप से हम सब अलग-अलग सूली पर लटके नज़र आयेंगे."

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Sunday, March 18, 2012

Asia's first robotic walk: A few small steps for Papa, one giant leap for the people of Chhattisgarh!


चलने की सरल प्रक्रिया- पैरों को एक के बाद उठाना ताकि शरीर को आगे बढ़ाया जा सके- उनके लिए अनगिनत अधिक महत्त्व रखता है जो कि, मेरे पिता अजीत जोगी जी के शब्दों में, "पिछले आठ सालों से किसी से आँखों में आँख डालकर बात नहीं कर सका" क्योंकि वो एक व्हीलचैर में बंध गया था. "अब, अंततः," वो कहते हैं, "कि मैं लोगों से आँखें मिलाकर बात कर सकूंगा."

ये विडियो क्लिप पापा को न्यू ज़ीलैंड की एक कंपनी रेक्स बायोनिक्स द्वारा निर्मित रोबोटिक पैर (इ-लेग्स) के जरिए चलते हुए दिखाता है. जब कंपनी उनके लिए ऐसे इ-लेग्स का लगभग दो महीनों बाद निर्माण कर लेगी, तो वे दुनिया के चौथे- और एशिया के पहले- इ-लेग्स इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति बन जायेंगे. उन्हें उम्मीद है कि इस तकनीकी क्रांति के चलते बहुत जल्द ही व्हीलचैर अतीत की चीज़ बन जाएगा.

हमारे परिवार और शुभ-चिंतकों के लिए आज- १७ मार्च २०१२- ज़िन्दगी का सबसे ज्यादा ख़ुशी का दिन बन गया है: पापा अकेले नहीं हैं जो नौंवे आसमान पर हैं!

The simple act of walking- lifting one's feet, one at a time, to propel one's body forward- assumes infinitely greater significance for someone who has, to use my father Mr. Ajit Jogi’s words, "not been able to make eye-contact with anyone for eight long years" because of having been straddled to a wheelchair. "Now, finally," he says, "I am able to look people in the eye when I talk to them."

This video-clip shows Papa taking his first steps in Mumbai using a robotic exoskeleton (called e-legs) developed by Rex Bionics, a New Zealand-based company. When his e-leg has been customized (in another 2 months or so), he would become the company's fourth e-leg user in the world (the other three being from the US, Canada and New Zealand)- and it is his fervent hope and desire that continuing advancements in technology would make wheelchairs a thing of the past.

Speaking for our family and well-wishers, today- 17th March 2012- has been, without doubt, the happiest, most momentous day of our lives: Papa is not the only one in Ninth Heaven!

Disclaimer: The author wishes to acknowledge that the background music is from Wolfgang Amadeus Mozart's Eine Kleine Nachtmusik. Read More (आगे और पढ़ें)......

Monday, January 10, 2011

New Year: "2010 के व्यक्ति" और "2011 में छत्तीसगढ़"

इस ब्लॉग पर पिछले साल एक नई प्रथा शुरू हुई थी: बीते वर्ष में जिस व्यक्ति ने हमारे प्रदेश (छत्तीसगढ़) को अच्छे या बुरे के लिए सबसे ज्यादा प्रभावित किया, उसे "साल के व्यक्ति" का खिताब दिया गया और आने वाले वर्ष में क्या होगा, उसकी भविष्यवाणी की गई.

(1)
2010 के व्यक्ति

२०१० के "साल के व्यक्ति" (Person of the Year) डॉक्टर विनायक सेन हैं. उनके मुकद्दमे- और सजा- ने हमारे प्रदेश को भारत का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण बुद्धिजीवी-दुनिया के आकर्षण का केंद्र बना दिया है. ये हमारे लिए गौरव की बात नहीं है.

उनके परिवार और केस, दोनों से मैं बहुत करीब से जुड़ा हुआ हूँ. उनका फ्लैट हमारे रायपुर के घर के ठीक सामने है. डॉक्टर सेन मेरी माँ के मेडिकल कॉलेज (वेलूर) में सीनियर थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद, हाल में आज़ाद हुए बंगलादेश जाकर उन्होनें भारत-पाकिस्तान युद्ध (१९७१) में सबसे क्षतिग्रस्त हुए इलाकों में निशुल्क चिकित्सा-सेवा दी. कई सालों तक डॉक्टर सेन अपनी पत्नी इलेना के साथ धमतरी और बालोद क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में गरीबों का इलाज करते रहे. गुरुर के पास आज भी उनका छोटा सा क्लीनिक है, जो लगभग बंद पड़ा है. वे मेरे पिता जी के शासनकाल में छत्तीसगढ़ मेडिकल बोर्ड के सदस्य थे: उस दौरान वे मितानिन (midwife) योजना के सूत्रधार बने, जो आज पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में लागू हो चुकी है. इस योजना के अंतर्गत गांवों की मितानिन को आवश्यक चिकित्सा प्रणाली- जैसे मलेरिया और दस्त का उपचार- में प्रशिक्षण देकर दूरदराज़ ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को बहुत हद तक पूरा किया जा रहा है.

सलवा जुडूम की आड़ में हो रहे अत्याचार- सैकड़ों गांवों से हज़ारों आदिवासियों को विस्थापित कर उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध भेड़-बकरियों की तरह "कैम्पों" में रखा गया, और उनको नक्सली-समर्थक बताकर मार डाला गया (अभी कुछ ही दिन पहले बीजापुर बस्ती में एक एस.पी.ओ. ने एक आदिवासी छात्र आशीष माझी की छाती में चार गोली दागकर दिन-दहाड़े ह्त्या कर दी)- को उन्होनें पी.यू.सी.एल. के माध्यम से उजागर किया, तो उन्हें नक्सलियों का डाकिया बताकर देशद्रोह जैसे संगीन जुर्म का दोषी करार दिया.

अगर गरीबों की सेवा करना और अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाना देशद्रोह है, तो ये हमारे प्रदेश- और देश- के लिए बेहद शर्म का विषय है. एक नागरिक और एक वकील होने के नाते मुझे पूरी उम्मीद है कि इस गलती को बहुत जल्दी सुधारा जाएगा.

(2)
2011 में छत्तीसगढ़

A. राजनीति:
(१) भाजपा में "आदिवासी एक्सप्रेस" चलेगी, आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग धीरे धीरे तूल पकड़ेगी: नंदकुमार साय और बलिराम कश्यप इसके सूत्रधार होंगे; शासन के कुछ मंत्री और सांसद इसको पीछे से बल देंगे. पूरी मुहिम नाकाम सिद्ध होगी, और डॉक्टर रमन सिंह अपनी कुर्सी पर बरक़रार रहेंगे.
(२) नया प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस को अंततः मिलेगा. वोरा-युग अब दिग्विजय-युग में तब्दील होगा. प्रदेश सरकार के खिलाफ दबे हुए जानाक्रोश को आन्दोलन का रूप देने में कांग्रेस, विशेषकर कांग्रेस के युवाओं, की अहम् भूमिका रह सकती है.
(३) छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, कम्यूनिस्ट, गोंडवाना और बहुजन समाज पार्टी के बीच आपसी तालमेल बढ़ेगा और दोनों राष्ट्रीय दलों के विकल्प के रूप में एक सशक्त और संयुक्त तीसरा मोर्चा बनाने के प्रयास किए जाएंगे. साधन और संगठन के अभाव में इसको कम सफलता मिलेगी.
(४) मंडी के अलावा दुसरे चुनाव न होने के कारण जातिवाद और राजनीति में पैसे का दुरूपयोग कम होगा.

B. कानूनी व्यवस्था/ प्रशासन:
(१) श्री कल्लूरी के नेतृत्व में दंतेवाडा में नक्सलियों से सीधा युद्ध छेड़ा जाएगा, इसमें कई निर्दोष लोग मारे जाएंगे. राजनांदगांव, सराईपाली, बसना, सारंगढ़ और गरियाबंद के जंगलों को अपना बेस बनाकर नक्सली रायपुर की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे. डॉ. बिनायक सेन बेगुनाह साबित होंगे.
(२) छोटे-बड़े शहरों में गुंडा-गर्दी, लूट और मार-काट बढ़ेगी. बेरोजगार युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा रहेगी. वे गली-गली में अवैध रूप से बिक रही शराब पीकर अपने गम गलत करेंगे.
(३) भ्रष्टाचार इतना व्यापक हो जाएगा की वो सार्वजनिक जीवन का मुद्दा ही नहीं रहेगा: आरोप लगेंगे, और हमेशा की तरह "मैच-फिक्सिंग" हो जाएगी!

C. अर्थव्यवस्था:
(१) सिंचाई, उद्योग और पीने के पानी की कमी बरक़रार रहेगी. सरकार इस भीषण समस्या से निपटने में पूरी तरह विफल रहेगी.
(२) जांजगीर, रायगढ़, कोरबा और भानुप्रतापपुर के रहवासी उनके क्षेत्र में अन्धाधुन तरीके से किए जा रहे औद्योगीकरण- और उसके दुष्प्रभाव (बढ़ते तापमान, घटता पानी, प्रदूषित वायू, जबरदस्ती किया गया विस्थापन)- के खिलाफ आवाज़ उठाएंगे, लेकिन पूंजीवादियों के दबाव में आकर सरकार उसे कुचलने का प्रयास करेगी.
(३) सरकार किसानों से वादा-खिलाफी करेगी: उन्हें न बोनस मिलेगा, न मुआवजा और न ही मुफ्त बिजली. इससे- और बढ़ती महंगाई से- उनकी आर्थिक स्थिति और जर्जर होगी. तेजी से बढ़ते शहरों से सटे हुए गांवों में इसका नाजाएज फायदा भू-माफिया उठाएगी. इसमें उन्हें शासकीय मदद भी मिलेगी.

D. संस्कृति:
(१) छत्तीसगढ़ी संस्कृति की धूम अब इन्टरनेट पे मचेगी- जो बहुत जल्द ही पारंपरिक मीडिया की जगह ले लेगा. सोशल नेटवर्किंग साईट "फेसबुक" पर २५,००० छत्तीसगढ़िया दस्तक देंगे.
(२) प्रदेश में पढ़ाई का स्थर, विशेषकर उच्च शिक्षा का स्थर, गिरेगा लेकिन फीस और बढ़ेगी. छात्रों में सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ेगा. सरस्वती शिशु मंदिरों और एकल विद्यालयों के माध्यम से आर.एस.एस. आदिवासी क्षेत्रों में अपनी जड़ें और गहरी करेगी.
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Friday, October 01, 2010

विश्वास की लड़ाई: छत्तीसगढ़ में युवा कांग्रेस चुनाव

Read this post in English here.

छत्तीसगढ़ में युवा कांग्रेस चुनाव की आठ-महीने लम्बी प्रक्रिया समाप्त हो गई है: प्रदेश भर से लगभग 400,000 नौजवानों ने अपने मताधिकार का प्रयोग करके 7500 पंचायत, 1000 वार्ड, 90 नगर पंचायत, 89 विधान सभा, 11 लोक सभा और प्रदेश समितियों का चयन कर लिया है. निःसंदेह ये हमारे प्रदेश के इतिहास में किसी भी राजनैतिक दल द्वारा चलाया गया सबसे वृहद् लोकतांत्रिक अभियान है. यही नहीं, छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य है जहाँ दोनों एन.एस.यू.आई. और युवा कांग्रेस के पदाधिकारी पूर्णतः निर्वाचित हैं. इस मायने में, राहुल जी की देशव्यापी क्रांति सबसे पहले हमारे प्रदेश में सफलतापूर्वक पूर्ण हुई है. यह हमारे लिए गौरव की बात है.

मैंने भी इस अभियान में अपनी छोटी सी भूमिका निभाई है: मुझे प्रदेश का दौरा करने के साथ साथ उसकी युवा पीढ़ी से मिलने का अवसर भी मिला.

इस चुनाव के 5 प्रमुख बिंदु निम्नानुसार हैं:
  • पहला, प्रदेश युवा कांग्रेस का नवनिर्वाचित अध्यक्ष उत्तम वासुदेव एक गरीबी रेखा कार्ड रखने वाला किसान का लड़का है. उसका गाँव, झाबर, मरवाही विधान सभा क्षेत्र में है. उसके चुनाव ने विरोधियों के आरोप कि इन चुनावों में धन-बल और बाहु-बल का खुला दुरूपयोग हुआ है, की धज्जियां उड़ा दी है.
  • दूसरा, प्रदेश के चारों संभागों को प्रदेश समिति में प्रतिनिधित्व का मौका मिला है: सरगुजा से दानिश रफीक, बस्तर से साकेत शुक्ला, बिलासपुर से उत्तम वासुदेव, सुश्री सुखबाई खूटे (अ.जा.) और पप्पू बघेल (अ.जा), और रायपुर से दीपक मिश्रा, आसिफ मेमन, संदीप साहू और अभिषेक मोदी.
  • तीसरा, चुनाव में केवल एक लोक सभा अध्यक्ष का पद आरक्षित रखा गया. इसके बावजूद 3 लोक सभा अध्यक्ष आदिवासी बने (बस्तर- कवासी हरीश, सरगुजा- बबला तिर्की, कोरबा- सुश्री बून्दकुन्वर मास्को); 2 अनुसूचित जाति के है (बिलासपुर- गोविन्द सेठी, जांजगीर- अशोक सोनवानी); और 3 मुसलमान (कांकेर- अमीन मेमन, दुर्ग- अयूब खान, राजनंदगांव- नवाज़ खान). इस प्रकार 11 में से 8 लोक सभा अध्यक्ष आरक्षित वर्ग के हैं.
  • चौथा, ८९ में से ८४ विधान सभा अध्यक्ष स्थापित स्थानीय पार्टी नेतृत्व की सक्रिय खिलाफत के बावजूद चुनाव जीते हैं; न की उनके समर्थन से. कई जगह वे स्थापित नेताओं की संतानों को हराकर जीते हैं. बस्तर लोक सभा में हरीश कवासी, जो की सुकमा का जनपद अध्यक्ष है, महेंद्र कर्मा के बेटे बंटी कर्मा को पराजित करके अध्यक्ष बना है. सन्देश स्पष्ट है: युवा पीढ़ी की पलटन चल पड़ी है; वह अब रुकने वाली नहीं है.
  • पांचवा, पिछले १ साल में राहुल गाँधी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में 100,000 छात्र एन.एस.यु.आई से, और लगभग 400,000 नौजवान युवा कांग्रेस से जुड़े हैं. इस प्रकार कांग्रेस पार्टी के दोनों युवा संगठनों की सदस्यता प्रदेश कांग्रेस से कम से कम 3 गुना अधिक हो गई है. समय आ गया है कि युवा कांग्रेस के साथ साथ अब हम कांग्रेस को युवा करने की ओर काम करें.

प्रदेश युवा कांग्रेस की पहली बैठक उत्तम के गाँव, झाबर, में २ अक्टूबर गाँधी जयंती को रखी गई है. भविष्य में युवा कांग्रेस शहरों से नहीं, गाँवों से चलेगी. ये मुनासिब भी है क्योंकि प्रदेश में युवा कांग्रेस के 75% सदस्य पंचायतों में रहते हैं.

युवा कांग्रेस के अपने साथियों को मैं दो सुझाव दूंगा: पहला, किसी प्रदेश-स्तरीय कार्यक्रम के बजाय वे ऐसे स्थानीय मुद्दों की पहचान करें, जिससे उनके क्षेत्र की जनता, विशेषकर युवाओं, का सीधा वास्ता है, और फिर इन मुद्दों को हल करने के लिए अपने नौजवान साथियों की टीम के साथ अभियान चलाये. दूसरा, ऐसा करने का 'पदयात्रा' से बेहतर तरीका नहीं है. लोगों को समझने के लिए, उनका विश्वास जीतने के लिए, उनके बीच में जाकर उनके साथ रहने से अच्छा रास्ता कोई नहीं है. साथ में, जिन पंचायतों में सदस्यता नहीं हुई है, वहां सदस्य बनाने का काम पूरा करें.

इस चुनाव ने हमें एक सीख दी है. हमारे साथ सदस्य, संसाधन और रणनीति भले ही हो, जब तक लोगों का विश्वास नहीं रहेगा, उस विश्वास को हासिल करने के लिए टीम नहीं रहेगी, किसी का भी नेता बनना संभव नहीं है. जब कोई भी सदस्य मतदान करने जाता है, वो बूथ के अन्दर अकेले रहता है, उसे कोई देखता नहीं रहता है. ऐसे में उसके मन में केवल एक प्रश्न उठता है: "मैं किस पर भरोसा करता हूँ?" मुझे बेहद संतोष है कि जो 90 साथी मेरे साथ नक्सली इलाकों में बस्तर सत्याग्रह के दौरान चले थे, उनमें से 52 विधान सभा अध्यक्ष, 11 लोक सभा अध्यक्ष, और 7 प्रदेश समिति के सदस्य निर्वाचित हुए हैं.

इसलिए मैं अपने युवा कांग्रेस के साथियों से निवेदन करता हूँ कि वे लोगों का विश्वास जीतने का हरसंभव प्रयास करें. यही राहुल जी की क्रांति का सार है: नेता बनने के लिए बड़े नेताओं के आगे-पीछे घूमना बंद करो; जनता के बीच में रहकर, कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतो. पदयात्रा करो, अपनी टीम बनाओ.


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Friday, January 15, 2010

NOTICE: मेरी वकालत भली...

प्रदेश में युवा कांग्रेस के चुनाव होने जा रहे हैं. अपने चुनाव लड़ने की बातें मैंने अखबारों में पढ़ी. इन खबरों से मैंने तत्काल विनम्रतापूर्वक यह कहकर इनकार कर दिया था कि मैं अपने वकालत के व्यवसाय में आगे बढ़ना चाहता हूँ और मेरी अभी राजनीति में आने की कोई इच्छा नहीं है.

इस ब्लॉग के माध्यम से मैं इस बात को फिर से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ.

राहुल जी की सोच है कि युवा वर्ग स्वयं अपने नेतृत्व का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से करे. मेरा भी यह मानना है कि चुनाव कौन लड़ेगा, इसका निर्णय बीजापुर से बलरामपुर तक के हमारे परिवार के युवा साथियों को लोकतांत्रिक तरीके से करना है; मैं खुद को ऊपर से थोपने में विश्वास नहीं रखता क्योंकि ऐसा करना हमारी पार्टी और राहुल जी के सिद्धांतों के विपरीत होगा. अभी हम सबका एकमात्र उद्देश्य यह होना चाहिए कि अधिक से अधिक युवा, खासकर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के युवा कांग्रेस पार्टी- और राहुल जी- की सोच से सीधे जुड़ें.

वैसे भी इन चर्चाओं को सुनकर मेरे हाल ही में बने मुवक्किलों में काफी असमंजस की स्थिति होने लगी है, जिसका सीधा नुकसान मेरी व्यवसायिक संभावनाओं को उठाना पड़ रहा है!

इसी सन्दर्भ में मुझे यह भी बताते हुए बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि परसों पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के वार्षिक दीक्षांत समारोह में विधि की परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने के लिए मुझे स्वर्गीय राजीव गाँधी स्मृति स्वर्ण पदक दिया जाएगा. इस पदक से मेरे माता-पिता और मुझे मिलने वाली ख़ुशी किसी भी चुनावी जीत की ख़ुशी से कई गुना बढ़कर होगी.

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Saturday, January 02, 2010

New Year: "२००९ के व्यक्ति" और "२०१० में छत्तीसगढ़"


दो नई परम्पराएं
वैसे तो ३१ दिसम्बर और १ जनवरी ग्रेगोरियन कैलेंडर के अन्य ३६३ दिनों की तरह सिर्फ दो तारीखें है. प्राकृतिक रूप से ये दूसरे दिनों से अलग नहीं हैं: दोनों दिन सुबह सूरज उगता है, और आकाश का अपना सफ़र पूरा कर शाम को ढल जाता है; चाँद-सितारे उसकी जगह ले लेते हैं.

देखा जाए तो इन दोनों तारीखों का महत्व मात्र मानव प्रजाति तक ही सीमित है और इस प्रजाति-विशेष पर भी इनका प्रभाव केवल मानसिक होता है. फिर भी इस मानसिक प्रभाव का अपना महत्त्व है: दोनों दिनों में अतीत और भविष्य का अनोखा सम्मिश्रण है: हर साल ३१ दिसम्बर की रात को जब ठीक १२ बजता है, तब उस एक क्षण में बीते हुए साल के गुजरने और नए साल के आने से जुड़ी सैकड़ों-अनगिनत भावनाओं का एकाएक समावेश हो जाता है.

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए, मैं इस वर्ष से ब्लॉग पर दो नई परम्पराओं की शुरुआत कर रहा हूँ. पहली: अतीत को सलाम करते हुए, हर वर्ष उस व्यक्ति को
"साल के व्यक्ति" के खिताब से नवाज़ा जाएगा जिसने हमारे प्रदेश, छत्तीसगढ़, को सर्वाधिक प्रभावित किया है. दूसरी: आने वाले साल में क्या-क्या होगा, उसकी भविष्यवाणी (और साल के अंत में, उस भविष्यवाणी का बेबाक विश्लेषण!).

भविष्य में इन दोनों पहलूओं पर आपके सुझाव आमंत्रित रहेंगे; और उन्हें ब्लॉग पर प्रमुखता से प्रकाशित भी किया जाएगा.

(१)
२००९ के व्यक्ति
२००९ के "साल के व्यक्ति" का खिताब संयुक्त रूप से श्री नरेश डाकलिया, श्रीमती किरणमयी नायक और श्रीमती वाणी राव को दिया जाता है. इन तीनों ने अपनी-अपनी व्यक्तिगत छवि और संबंधों के कारण न केवल राजनैतिक अनुमानों को बल्कि दशकों के इतिहास को भी सर के बल पलट कर रख दिया, और राजनैतिक रूप से छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण शहर, राजनांदगांव, जो की स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री का विधान सभा क्षेत्र है, और प्रदेश के दो सबसे बड़े शहर, रायपुर और बिलासपुर, के वासियों का विशवास हासिल कर वहां के प्रथम नागरिक चुने गए.

प्रदेश के एक नेता ने हाल ही में इस ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया कि इन तीनों में ख़ास बात यह है कि वे प्रदेश के किसी भी बड़े नेता के "पिछलग्गू" नहीं कहे जा सकते; उनका स्वयं का अस्तित्व है, अपनी खुद की पहचान है. यही वजह है कि उन्हें बरसों से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने के बावजूद कभी भी किसी चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार नहीं बनाया गया.

और जब टिकट दी गयी तो शायद यह सोचकर कि वैसे भी इन सीटों में कांग्रेस का जीतना न केवल मुश्किल है बल्कि नामुनकिन. आखिरकार, पिछले बीस सालों से कांग्रेस के उम्मीदवार रायपुर और बिलासपुर शहरों में क्रमशः ३०००० और १५००० मतों से ज्यादा के अंतर से हारते आ रहे थे; और जहाँ तक राजनांदगांव की बात है, तो यहाँ हाल ही में मुख्य मंत्री जी लगभग ४०००० वोटों से जीते हैं. मुझे लगता है कि इस बात का फायदा भी इन तीनों को मिला: एक तरफ तो सत्ता के नशे में धुत भाजपाई अति-आत्मविश्वास से ग्रसित रहे; वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस में उनके विरोधीयों ने यह सोचकर कि वैसे भी वे हार रहे हैं, भीतरघात में ज्यादा सक्रिय रहना जरूरी महसूस नहीं किया.

इस बात से हमें तीन महत्वपूर्ण सीख मिलती है. पहली: बड़े नेताओं के आगे-पीछे घूमना इतना जरूरी नहीं है. दूसरी: जनता के बीच सक्रिय बने रहना, उनके सुख-दुःख में भागीदारी रखना, राजनीति में अधिक महत्व रखता है. तीसरी: धीरज रखना, और कभी भी अपना धैर्य न खोना, पद मिले या न मिले. राजनीति के इस दौड़ में श्री नरेश डाकलिया, श्रीमती किरणमयी नायक और श्रीमती वाणी राव ने यह साबित कर दिया कि जीत कछुए की ही होती है.

(२)
२०१० में छत्तीसगढ़
A. राजनीति:
(१) भाजपा आलाकमान में २००९ के अंत में हुए परिवर्तन का प्रभाव प्रदेश की राजनीति पर पड़ेगा तो जरूर पर प्रदेश के नेतृत्व में परिवर्तन होने की संभावना २०१० में क्षीण ही रहेंगी. श्री राजनाथ सिंह का जो डॉ. रमन सिंह को अभयदान प्राप्त था, अब वो नहीं रहेगा. इस से उन्हें विफल करने में और उनकी विफलताओं का फायदा लेने में उनके विरोधी ११ अशोक रोड में सक्रिय तो होंगे, लेकिन केंद्रीय स्थर पर कमज़ोर भाजपा अनुशासन को ज्यादा महत्त्व देते हुए, मुख्य मंत्री और उनके विरोधियों (जिनकी संख्या में इजाफा होगा), दोनों पर नकेल कसने और उनके बीच संतुलन बनाने के प्रयास में लगी रहेगी.

(२) कांग्रेस में पीढ़ी-परिवर्तन का दौर और तेज होगा. नए-नौजवान चहरों को महत्त्व दिया जाएगा; उनका चयन ऊपर से नहीं होगा, बल्कि पार्टी के युवा सदस्य सीधे चुनाव के माध्यम से करेंगे.

(३) पंचायत चुनाव में अधिकतर पदाधिकारी दुबारा निर्वाचित नहीं होंगे. ज्यादा तर पढ़े-लिखे नौजवान लोग ही चुने जायेंगे. भविष्य में पार्टी और पैसे का कम, व्यक्ति की निजी छवि और संबंधों का ज्यादा प्रभाव होगा.

(४) छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच दुर्ग की राजनीति में अंततः अपना खाता खोलेगी.

B. कानूनी व्यवस्था/ प्रशासन:
(१) नक्सलवाद पर सीधा फौजी आक्रमण केंद्रीय बलों के नेतृत्व में बोला जाएगा, इसमें सफलता भी मिलेगी. केंद्र
सलवा जुडूम से समर्थन वापस लेगा, वो एक विफल प्रयोग के रूप में इतिहास के पन्नो में दफ़न हो जाएगा. मानव-अधिकार के उल्लंघनों की वारदातें बढ़ेंगी, मीडिया उन्हें उजागर करने में कमज़ोर साबित होगी, लेकिन वहां सक्रिय सामाजिक संस्थायों की बातों को केंद्र गंभीरता से लेगा. निर्दोष आदिवासी मारे जायेंगे. शहरी क्षेत्र में प्रदेश की पहली बड़ी नक्सली घटना होगी. डॉ. बिनायक सेन बेगुनाह साबित होंगे.

(२) बड़े शहरों में गुंडा-गर्दी और बढ़ेगी. बेरोजगार युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा रहेगी.

(३) प्रशासन और हावी होगा: सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सूचना लेने की प्रक्रिया को और कठिन बनाया जाएगा; केंद्र द्वारा प्रशासन को और अधिक जवाबदेह बनाने के कानूनी प्रयासों का भी प्रदेश में यही अंजाम होगा; प्रशासनिक खर्चों और भ्रष्टाचार में इजाफा होगा. लेकिन इन सब के विरोध में दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई का कोई असर नहीं होगा.

C. अर्थव्यवस्था:
(१) पानी, सिचाई और पीने दोनों, की बेहद कमी होगी. इस से कृषि पर तो सीधा प्रभाव पड़ेगा ही, साथ-साथ बड़े शहरों में भी त्राहि मचेगी. सरकार इस भीषण समस्या से निपटने में पूरी तरह विफल रहेगी.

(२) जितने भी अब तक की खदानें (कोयला, लोहा) बड़े-बड़े उद्योगों को आबंटित करी गयी हैं, उनमे से शायद ही एक-दो ही स्टील और बिजली का उत्पात शुरू कर पाएंगी. बाकी सब प्रशासन से साथ-गाँठ करके कोयले इत्यादि की काला-बाजारी ही करते रहेंगे. इसका सीधा-सीधा नुकसान प्रदेश के युवाओं को होगा: न नए उद्योग खुलेंगे, न उन्हें रोज़गार मिलेगा.

(३) भू-माफिया के आपस के खेल में जमीनों और घरों के भाव जम के बढ़ेंगे लेकिन इनमे घर बनाने वालों और रहने वालों की कमी रहेगी. अधिकतर जमीन और घर खाली ही रहेंगे.

D. संस्कृति:
(१) छत्तीसगढ़ी फिल्मों की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन २००९ की सुपरहिट, मया, का कोई मुकाबला नहीं कर पायेगा. छत्तीसगढ़ी गानों की टी.वी. चैनलों और वीसीडी के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में धूम बनी रहेगी.

(२) क्षेत्रीय टी.वी. चैनलों में कर के अभाव से प्रोग्राम्मिंग का स्थर गिरेगा. केबल माफिया के केन्द्रीयकरण के प्रयासों से केबल-वार होगी, जिसका भार सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.

(३) मीडिया पर सरकारी तंत्र हावी रहेगा. इसके दो प्रमुख कारण रहेंगे: पहला, विपक्ष की सरकार की आलोचना करने में कमजोरी; दूसरा, गैर-सरकारी स्रोतों से आय के अभाव में सरकारी मदद पर छत्तीसगढ़ी मीडिया की बरकरार निर्भरता.
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Saturday, October 17, 2009

An Interview with An Advocate: एक वकील से साक्षात्कार


The Editorial Board of the daily, Chhattisgarh Watch, led by its erudite editor, Mr Ramavtar Tiwari, interviewed me recently on various aspects of my life. The interview was published in its edition of 6.10.2009. It is reproduced here with his very kind permission.

अमित जोगी का नाम एक समय खासा चर्चित रहा है. विवादों और संघर्षों का अमित के साथ चोली-दामन का साथ रहा है. एक समय वे प्रदेश में शक्ति के दूसरे केंद्र के रूप में जाने जाते थे. उस दौर में अमित की तूती बोलती थी, यह कहना गलत नहीं होगा. हालांकि इन बातों से वे इनकार भी करते हैं. श्री जोगी के पास स्पष्ट सोच है और वे अपनी बातों को बड़े सलीके से रखते हैं. "छत्तीसगढ़ वॉच" ने उनके जीवन के अलग-अलग पहलुओं को स्पर्श करने की कोशिश की है.

आप शादी कब कर रहे हैं?
नए जीवन की नई शुरुआत है. पहले इरादा सेटल होने का है. माता-पिता जब आदेश देंगे, शादी कर लेंगे. वे ही रिश्ता तय करेंगे. मेरा मानना है कि शादी दो विभिन्न परिवारों का सम्बन्ध है, जिसमे पहले बड़ों की सहमती होनी चाहिए. उसके बाद हमारी सहमती की बात आती है.

कैसी दुल्हन की कल्पना है?
घरेलू हो और माता-पिता की सेवा करे.

आपके आदर्श कौन हैं?
व्यक्तिगत जीवन में मेरे पिता जी ही मेरे आदर्श हैं. उनमें जबरदस्त विल-पॉवर है. उनसे मैं नीचे से ऊपर उठने की प्रेरणा प्राप्त करता हूँ. वैचारिक रूप से पंडित जवाहर लाल नेहरु मेरे आदर्श हैं. अनेकता में एकता की विचारधारा को उन्ही ने साकार किया है. देश स्वतंत्रता के पहले से ही अलग-अलग भाषा-बोली, वर्गों, वर्णों और क्षेत्रों में बंटा था. नेहरु जी ने ही सही मायनों में भारतीयता का निर्माण किया है.

पिता के किन गुणों से प्रभावित हैं?
पिता जी की दृढ़ इच्छा शक्ति से मैं बहुत प्रभावित हूँ. सोचता हूँ की वे इतनी शक्ति कहाँ से इकट्ठी करते हैं! वे प्रदेश की जनता से खुद को सीधा जुड़ा महसूस करते हैं. इसे मैं "excessive self identification" कहता हूँ. लोगों से सीधे तौर पर जुड़ने की यह प्रवृत्ति ही शायद उनकी इच्छा शक्ति बनती है. वे कहते भी हैं की मेरे दोनों पाँव नहीं है तो क्या हुआ, छत्तीसगढ़ की दो करोड़ जनता के चार करोड़ पाँव मेरे ही हैं. उन्हें ये ताकत जनता से मिलती है और मैं इन्ही बातों से प्रभावित हूँ.

पिता की लोकप्रियता के बारे में क्या कहते हैं?
छत्तीसगढ़ ने उन्हें बहुत प्यार दिया है.

आप भी लोकप्रिय हैं.
हो सकता है, लोग यह सोचते हैं, पर उनसे तुलना मैं नहीं कर सकता.

छत्तीसगढ़ से कांग्रेस क्यों उखड़ी?
उखड़ गई यह कहना ठीक नहीं है, यह कहना चाहिए की लड़खड़ा गई है. विशेष रूप से आदिवासी इलाकों में कांग्रेस संगठन से कमजोर है. कांग्रेस के ४ मोर्चा संगठनों की अपेक्षा RSS की ५७ संस्थाएं हैं जो इन इलाकों में गहरी पैठ बनाने में लगी हुई हैं. संकल्प कोचिंग, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण और वाल्मीकि आश्रम, और सरस्वती शिशु स्कूल आदि के माध्यम से वे लोग काम कर रहे हैं. वे २४ घंटे, सातों दिन और बारहों महीने सक्रीय हैं. लेकिन कांग्रेस के संगठन फील्ड में नहीं दिखते. फिर भी यह बात भी नकारी नहीं जा सकती कि कांग्रेस, और विशेषकर नेहरु-गांधी परिवार, का यहाँ आज भी प्रभाव है. पर हमारा संगठन इसका लाभ नहीं ले पा रहा है. कांग्रेस को संघ से सीखना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा.

मेरा मानना है की कांग्रेस संगठन के रूप में कम, एक जनांदोलन के रूप में ज्यादा लोकप्रिय है. कांग्रेस अब फिर उठने की प्रक्रिया में चल पड़ी है, और राहुल जी इस अभियान के सूत्रधार के रूप में उभरे हैं. वे संगठन के ढाँचे को मजबूत करने में लगे हैं. पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात, पुदुचेरी और छत्तीसगढ़ में युवा संगठनों के चुनाव नीचे स्थर से पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हुए हैं. इस से पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र आ रहा है. छत्तीसगढ़ में भी हाल ही में NSUI के चुनाव निर्वाचन पद्धति से संपन्न हुए हैं. सिर्फ ४० दिनों में ८०००० छात्र-सदस्य बनाए गए. इन छात्रों ने लगभग ४८०० प्रतिनिधियों का चयन किया, और उन्होनें जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्थर पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव किया है. यह राहुल जी और कांग्रेस की एक बड़ी उपलब्धि है. इन सभी चुनावों को पार्टी ने नहीं बल्कि भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, श्री लिंगदोह, की संस्था, FAME, ने करवाए. राहुल गाँधी का प्रयोग सफल रहा है.

कांग्रेस में गुटबाजी पर आप क्या कहेंगे?
कांग्रेस सिर्फ नेहरु-गाँधी परिवार के बैनर के तले है. कोई भी व्यक्ति का कोई गुट नहीं है. कांग्रेसजनों का वास्ता सिर्फ इस एक परिवार से है, और किसी से नहीं. वे ही सर्वोपरि हैं. पूरे देश में सिर्फ इस एक परिवार के प्रति जबरदस्त अपनत्व का भाव है. राहुल जी की सक्रियता से पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र कायम होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. आतंरिक चुनावों से पार्टी मजबूत होगी. "Youth Transforming" (युवा परिवर्तन) अभियान के तहत आने वाले दो सालों में सभी प्रदेशों में चुनाव निपटा लिए जायेंगे. और जहाँ तक गुटबाजी का सवाल है तो मैं चाहूँगा कि यह ख़त्म हो. मैं समझता हूँ कि पार्टी में युवा नेतृत्व को, NSUI और युवा कांग्रेस के माध्यम से उभारने की जो कोशिश शुरू की है, उससे भी गुटबाजी पर रोक लगेगा.

आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों के सन्दर्भ में क्या रणनीति होगी?
स्थानीय निकाय चुनाव में युवाओं को आगे आना होगा. इन चुनावों में पार्टी और मुद्दों की अपेक्षा व्यक्तिगत छवि ज्यादा मायने रखती है. लोग व्यक्ति देखकर वोट करते हैं, ऐसे लोगों को चुनते हैं जो उनके सुख-दुःख, दुःख-दर्द में शामिल होते हैं, जिनका सीधा सततः संपर्क उनसे होता है. (इस प्रसंग में अमित जोगी ने बृजमोहन अग्रवाल की व्यवहारिकता, मिलनसारिता की खूब तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि श्री अग्रवाल न सिर्फ शादी-ब्याह के मौके पर उपस्थित रहते हैं बल्कि करनी-मरनी के मौके पर भी उपस्थित रहते हैं. चुनाव में पार्टी नहीं, बृजमोहन जी जीतते हैं.)

आखिर युवा आगे कैसे आयेंगे?
मेरी सोच है कि युवाओं को स्थानीय चुनाव में ज्यादा से ज्यादा मौका दिया जाना चाहिए. कांग्रेस में जीतने की क्षमता और युवा होना, चुनावों में मापदंड के रूप में अपनाए जाने चाहिए.

क्या युवाओं के लिए आरक्षण होगा?
ऐसा फिक्स नहीं है.

अजीत जोगी दुष्प्रचार के शिकार हुए हैं. क्या आप सहमत हैं?
राज्य बनने के बाद उन्हें प्रदेश का नेतृत्व मिला. तब तक प्रदेश पर कुछ लोगों का एकछत्र राज था. तमाम महत्वपूर्ण पदों में उनका दबदबा था. इस वर्ग में, "speaking class" में, अजीत जोगी जी की स्वीकार्यता नहीं बन पाई. विशेष रूप से राजधानी में.

जोगी जी पर तानाशाही के आरोप भी लगाये जाते रहे हैं. आप क्या सोचते हैं?
जोगी जी यह मानते हैं कि दो करोड़ छत्तीसगढ़ के वासी उनके साथ हैं. जनता से उनका यह प्रेम कभी-कभी कमजोरी भी बन जाता है. वे अन्याय को जब कभी व्यक्तिगत रूप से लेते हैं, और उस पर प्रतिक्रया व्यक्त करते हैं, तब लोग उन्हें हिटलर कह देते हैं. ठीक वैसे ही जब फ्रांस के सम्राट लुइ चौदह कहा करते थे, "l'etat c'est moi" (मैं राज्य हूँ). जोगी जी भी खुद को छत्तीसगढ़ से उतना ही जुड़ा महसूस करते हैं. लोग इस गहरे प्यार को दुसरे ढंग से देखते और समझते हैं. मैं तो मानता हूँ कि आज राजनीति में ध्यानचंद का ज़माना नहीं रह गया. इस डी से उस डी तक अकेले गेंद ले जाने का अब चलन नहीं है. छोटे-छोटे पास देने का ज़माना है. इसके लिए टीम वर्क जरूरी है. संतुलन, समन्वय और टीम वर्क होना चाहिए. सभी को महत्व देने की जरूरत है.

भाजपा और RSS के बारे में क्या विचार है?
संघ की सादगी ख़त्म हो गयी है. व्यक्तिवाद के सामने, संघ और भाजपा दोनों दब से गए हैं. ठाकरे जी जैसी सरलता और सादगी ख़त्म हो गई है. कहने का मतलब है, संघ और भाजपा विचारधारा से हटकर अब व्यक्ति-केन्द्रित ज्यादा हो रहे है.

कहा जाता है रमन सिंह के सौम्य चेहरे ने दुबारा भाजपा की वापसी की है.
मैंने पहले ही कहा है कि जोगी जी दुष्प्रचार का शिकार हुए हैं. फिर कारण चाहे जो भी हो, भाजपा को दुबारा जनादेश तो मिला है. जनादेश का मतलब सौ खून मुआफ!

अजीत जोगी और रमन सिंह में क्या अंतर है?
सिर्फ किस्मत का. रमन सिंह जी की तकदीर ज्यादा बुलंद है. कुछ पद राजनीति में ऐसे होते हैं, जैसे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, जो सिर्फ तकदीर से मिलते हैं. संघर्ष से विधायक, सांसद या फिर मंत्री तो बना जा सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जैसे पदों के लिए भाग्य का सहारा भी जरूरी है. भाजपा में रमन सिंह जी से वरिष्ट, अनुभवी और ज्यादा संघर्षशील लोग हैं पर भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया.

लोग कहते हैं कि जोगी परिवार के रणनीतिकार आप हैं. आप क्या कहते हैं?
मैं कांग्रेस का सदस्य हूँ. मरवाही का मतदाता हूँ. अन्य कांग्रेसजनों की तरह वे मेरे सुझावों को भी सुनते हैं.

लोग राजनीति को गन्दी कहते हैं. आपके क्या विचार हैं?
मैं ऐसा नहीं मानता. भारत चाणक्य का देश है. आज भी राजनीति के बहुत से नियम और नीतियाँ घोषित और अघोषित रूप से चाणक्य-विष्णुगुप्त-कौटिल्य की बताई हुई चल रही है. राजनीति को समाज सेवा से अलग रख कर देखे जाने कि जरूरत है. राजनीति परिवर्तन लाने का सबसे तेज और सशक्त माध्यम है.

क्या आप चुनाव लड़ना चाहते हैं?
राजनीति में जब भी आऊँगा, सार्वजनिक जनादेश लेकर ही आऊँगा. जनता की स्वीकृति अंतिम और अनिवार्य है.

आपकी महत्वाकान्शाएं क्या हैं?
महत्वाकान्शाएं तो बहुत थी, पर जेल से लौटने के बाद वे सारी ख़त्म हो गयी. कीमती कपडों, घड़ी और जूतों का शौक था, अब वह भी नहीं रहा. अब ऐसे मेहेंगे शौक पालने की आत्मा गवाही नहीं देती.

आपकी ज़िन्दगी का दुखद पल कौन सा है?
पिता जी की भयंकर दुर्घटना और मेरा जेल जाना. जेल में मैंने जिंदगी का पाठ पढ़ा है. दुखी को निकट से देखा, समझा. कुल मिलाकर जेल में मेरा दूसरा जन्म हुआ है.

क्या गुस्सा आता है?
अब काफी हद तक वो भी नियंत्रित हो गया है. जरूरी हुआ तो कुछ अत्यंत ही करीबी लोगों के सामने उजागर करता हूँ. मन में अब ऐसी भावना ही नहीं रही कि किसी पर गुस्सा करूं.

अपराध बढ़ रहे हैं, आप क्या सोचते हैं?
हर क्षेत्र में अपराध बढ़ा है. कानून-व्यवस्था और प्रशासन के अलावा और भी कारण हैं. अपराधियों के बरी हो जाने का दोष वकीलों को नहीं देना चाहिए. जो कोर्ट से बरी हो जाएँ, उन्हें निर्दोष मानना ही सभ्य व्यवहार है. कोर्ट के निर्णय से पहले ही फैसले न हों. हमारी न्याय-प्रणाली बहुत सुदृढ़ है, हमें उसपे भरोसा रखना चाहिए. अब तो त्वरित न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये जा रहे हैं, ग्राम अदालतों का गठन किया जा रहा है, कोर्ट के बाहर विवाद अनिवारण के तरीकों को कानूनी प्रोत्साहन मिल रहा है.

देश की न्याय-पध्दति सुस्त रफ़्तार है. आप क्या सहमत हैं?
चाहे जो हो, पर लोगों का भरोसा आज भी न्यायपालिका पर है. साधन की कमी न्याय में देरी की वजह है. देश की अदालतों में न्यायधीशों के हजारों पद आज भी रिक्त हैं. यह सरकार की जिम्मेदारी है कि इन पदों पर भरती प्रक्रिया शुरू हो, सक्षम लोगों का चयन हो. कोर्ट के समक्ष छोटे-मोटे विवादों की संख्या भी बढ़ी है. बहुत से ऐसे मामलों में लोक अदालतें कारगार हो सकती हैं.

बड़े बाप का बेटा होना कैसा लगता है?
लाभ है तो हानि भी है. मुझ पर आपराधिक मामला भी नहीं चलता. पर फिर लोगों का, विशेषकर से युवा वर्ग का, प्यार भी नहीं मिल पाता.

पहली कमाई का आपने क्या किया था?
पिता जी के हाथों में रख दिया. उनके चेहरे पर आये संतोष और गर्व के भाव देखकर बहुत ख़ुशी हुई थी. अब घर-खर्च में भी हिस्सेदारी निभाने लगा हूँ. बिजली और फोन का बिल का भुगतान मेरे हिस्से आ गया है.

आजकल आपके ब्लॉग में कोई नई बात नहीं आ रही है.
आजकल कोर्ट में ही व्यस्त हो गया हूँ. इसलिए बाकी गतिविधियों को ज्यादा समय नहीं दे पा रहा हूँ. जल्द ही ब्लॉग के लिए भी समय निकालने की कोशिश करूंगा.

सुना है आपने किताब भी लिखी है.
हाँ. जेल में चिंतन-मनन का मौका मिला. जेल डाईरी लिखी, जल्द ही छपेगी. इसमें जेल में मैंने जो देखा, जो महसूस किया, उसे इमानदारी से लिखा. इसके छपने के बाद हो सकता है कि बहुत से लोगों को अड़चन भी होगी. जेल में नाटक भी लिखा, और कविताएँ भी.

कोर्ट कि जिंदगी कैसी लग रही है?
रोज़गार के लिए मैंने वकालत को अपनाया है. इसलिए पूरी तन्मयता से वकालत कर रहा हूँ. पहले कानून मेरा पीछा करता था, अब मैं कानून का पीछा कर रहा हूँ. मुकद्दमे के दौरान, कठघरे में, ही मैं कानून की बहुत सी बारीकियों को जान सका. ये मेरी प्रैक्टिकल ट्रेनिंग थी. अब कोर्ट में जिरह-बहस के दौरान विशवास आता जा रहा है, सभी का सहयोग और आर्शीवाद भी मिल रहा है. वैसे वकालत मेरा पेशा है. हर वर्ग के, हर किस्म के क्लाइंट हैं. भाजपा के भी बहुत से लोग मेरे मुवक्किल हैं.

जसवंत सिंह की किताब पर आपके क्या विचार हैं?
इस किताब को मैं इतिहास मानता हूँ. ये एक शोध-परक पुस्तक है. इसे मैं आधे से ज्यादा पढ़ चुका हूँ. अडवाणी जी की आत्मकथा, My Country, My Life, भी पढ़ चूका हूँ. जसवंत सिंह जी के विचार अडवाणी जी से मेल खाते हैं.

त्यौहार कौन सा पसंद है?
होली, ईद और बड़ा दिन ख़ास तौर पर पसंद हैं. पर सभी त्यौहारों को मनाता हूँ. एक दिन का सांकेतिक रोजा रखता हूँ, जन्माष्टमी पर उपवास करता हूँ, पूरी आस्था से नवरात्रि, होली-दिवाली मनाता हूँ. मैंने प्रायः सभी धर्मों का अध्ययन किया है. सभी धर्मों के त्यौहार और सिद्धांत आपसी भाईचारे की सीख देते हैं. इसे धर्मशास्त्री गोल्डन रूल कहते हैं.

कैसा भोजन पसंद है?
लोग जिंदा रहने के लिए खाते हैं, और मैं खाने के लिए जिंदा हूँ! ("Il faut vivre pour manger et ne pas manger pour vivre": Moliere, Le Malade imaginaire) शाकाहारी और मासाहारी, दोनों का बराबर शौक है. मेरी भोजन-प्रियता देखकर पिता जी कई बार कहते हैं कि मेरी जिंदगी लंच और डिनर तक ही सीमित है. मेरी अपनी सोच है कि मैं खाने या नाश्ते की टेबल पर अपनी बात ज्यादा सही ढंग से रख सकता हूँ. आमने-सामने चर्चा यहीं अपनत्व भरे माहौल में ज्यादा आत्मीयता से होती है जबकि जनसभाओं में सीधा संवाद नहीं हो पाता. माइक के सामने खड़े होकर भाषण देने से संवाद कायम नहीं होता, एकालाप होता है. बोलना ख़त्म होते ही संपर्क टूट जाता है.

फिल्मे देखते हैं?
हाँ, मगर हिंदी के मुकाबले विदेशी फिल्मे ज्यादा देखता हूँ. नायिकाओं में वहीदा रहमान जी बेहद पसंद हैं, उनकी टाइमलेस ब्यूटी है. नायकों में बलराज साहनी जी और खलनायकों में अमरीश पूरी जी पसंदीदा कलाकार हैं.

इन दिनों आपके क्या शौक हैं?
लिखना और पेन्टिंग करना मुझे पसंद है.

अपनी विशेष उपलब्धि किसे मानते हैं?
अभी तक ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है जो उल्लेखनीय हो.

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Tuesday, August 11, 2009

NSUI Elections in Chhattisgarh: आई रे आई, एन.एस.यू.आई.

नोट: लेखक सन १९९८ से २००२ तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, में एन.एस.यू.आई. के सक्रीय सदस्य के रूप में कार्यरत रहे. इस लेख को दैनिक नई दुनिया द्वारा १८.७.२००९ को प्रकाशित किया गया था.
छोटी सी आशा
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के छात्र संगठन, एन.एस.यू.आई., के चुनाव हो रहे हैं. उत्तराखंड के बाद छत्तीसगढ़ दूसरा राज्य है जिसे पार्टी ने चुनाव के लिए चुना है, जो अपने आप में हमारे लिए गर्व की बात है: कांग्रेस, कांग्रेस की विचारधारा, और कांग्रेस के युवा नेतृत्व, जिसके प्रतीक स्वयं राहुल गाँधी हैं, से सीधे जुड़ने का अवसर हमारे प्रदेश के छात्रों को मिला है. इसका पूरा पूरा लाभ उनको लेना चाहिए.

इस प्रक्रिया से प्रदेश में पार्टी में जो मायूसी के बादल छाय हुए हैं, हटना शुरू होंगे, और एक ऐसे नए नेतृत्व, जिसका सीधा सम्बन्ध यहाँ के छात्र जीवन से है, का जन्म होगा.

संगठन चुनाव पार्टी के लिए कितना महत्व रखते हैं, इसका अंदाजा केवल इस एक बात से लगाया जा सकता है: लोक सभा की शानदार जीत के ठीक बाद जब उस जीत के सूत्रधार, श्री राहुल गाँधी, से पुछा गया कि उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि वे क्या मानते हैं, तो उन्होंने दो-टूक जवाब दिया:
उत्तराखंड, पंजाब और गुजरात में हुए कांग्रेस के युवा संगठनों के चुनाव.

उनके इस कथन के पीछे बहुत ही सरल किन्तु दूरगामी सोच निहित है.

हल्ला बोल
वामपंथियों और आर.एस.एस. की तरह कांग्रेस कभी भी काडर पर आधारित पार्टी नहीं रही है. मेरा तो यहाँ तक मानना है कि कांग्रेस कभी भी पार्टी/संगठन के रूप में सफल नहीं रही है: महात्मा गाँधी से लेकर सोनिया गाँधी तक, कांग्रेस ने जब भी एक जनांदोलन का रूप धारण किया है, तभी उसे सफलता हासिल हुई है. और किसी भी जनांदोलन का निर्माण तभी हो सकता है जब जनता अपने नेतृत्व का चयन स्वयं करे, न कि उस पर ऊपर से 'नेता' थोपे जाएँ.

लगभग पिछले एक दशक से कांग्रेस, और विशेषकर कांग्रेस के युवा संगठनों, में नेतृत्व का निर्णय पार्टी के बड़े नेताओं से पूछकर किये जाने की परम्परा बन गई थी. इसका नतीजा यह रहा कि पार्टी में अधिकतर लोग संगठन से कम, और अपने नेताओं के प्रति अधिक समर्पित थे; संगठन - या जनता- की चिन्ता न करके वे अपने आकाओं की खुशामद करने में ज्यादा लगे रहे. और इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा. ऐसे ऐसे नेताओं को पार्टी में जिम्मेदारी मिली जिनका संगठन और जनता, दोनों से दूर दूर तक का कोई लगाव नहीं था.

ज़रा होल्ले होल्ले...हम भी पीछे हैं तुम्हारे!
सवाल ये उठता है कि चुनाव-
जो कि सही मायने में चुनाव हो न कि जैसे वर्तमान में वोटर/डेलीगेट पहले से तय करके प्रदेश में करवाए जाते हैं- केवल कांग्रेस के युवा संगठनों में क्यों कराये जा रहे हैं? ऐसे चुनाव मुख्य संगठन, कांग्रेस, में क्यों नहीं हो रहे हैं? मेरी समझ से इसका कारण यह है कि यदि कांग्रेस में इस प्रकार के चुनाव एकदम से कराये जाते हैं, तो शायद पूरी व्यवस्थता अस्त-व्यस्त हो जायेगी.

पंडित नेहरू के करीबी रहे अंग्रेज़ समाजवादी-इतिहासकार,
अर्नाल्ड तोय्न्बी, के अनुसार सफल परिवर्तन धीरे-धीरे, सोच समझकर, नई-पुरानी चुनौतियों से जून्झते हुए, अपनी गलतियों से सीख लेकर, उनको सुधार कर, एक-एक सीड़ी चढ़ कर, होता है. श्री राहुल गाँधी इस बात को भली-भाँती समझते हैं. इसलिए देश के विभिन्न प्रान्तों में, एक-एक कर, पार्टी के युवा संगठनों के चुनाव करवा कर, वे संभल-संभल के, धीरे-धीरे, सम्पूर्ण परिवर्तन की ओर बढ़ रहे हैं.

आखिरकार, आज के छात्र और युवा नेता ही तो कल कांग्रेस के मुख्य संगठन का नेतृत्व करेंगे: अगर संसद को ही देख लें, तो उसमें कम से कम ३४ ऐसे सांसद हैं जो कांग्रेस के युवा संगठनों में आज भी सक्रीय रूप से सदस्य हैं.

जाग, मुसाफिर, जाग ज़रा
लोकतंत्र का मतलब मात्र चुनाव से नहीं है. प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के चिन्तक, सुनील खिलनानी, ने अपने शोध, "
ऐन आईडिया ऑफ़ इंडिया", में लिखा है कि भारतीय लोकतंत्र शायद इसलिए इतना विकसित नहीं हो पाया है क्योंकि हमने अब तक अपने लोकतंत्र को 'चुनावों के पंचवर्षीय तमाशे' से ऊपर उठने ही नहीं दिया है: चुनाव के साथ-साथ आवश्यक है, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संस्कृति, जैसे कि संसदीय प्रणाली और बहस, का विकास, जिसका अभाव अब भी हमारे देश में है.

युवा संगठनों के चुनावों में भी इस अभाव को महसूस किया जा सकता है. पार्टी के आतंरिक चुनाव होने के कारण, छात्र नेता मुद्दों पर नहीं, बल्कि अपने-अपने व्यक्तित्व- जिसमे उनके बड़े नेताओं से सम्बन्ध और वोटों को एन-केन-प्रकारण प्रभावित करने की अन्य समस्त क्षमताएं समाहित हैं- के बलबूते पर चुनाव लड़ते हैं. ऐसे में, स्वाभाविक तौर से ऐसे छात्र जिन्हें आला नेताओं का वरदहस्त प्राप्त नहीं है, या फिर वे धन-बल से कमजोर हैं, दूसरों की अपेक्षा कमजोर पड़ जाते हैं. (इन चुनावों में सदस्यता-फीस १० रूपये है, जिसे छात्रों को स्वयं देना चाहिए, न कि किसी दूसरे को जो कि खुद चुनाव लड़ने-लड़वाने में इच्छुक हो.)

इस समस्या का समाधान एक ही है: छात्रों को अपना वोट देते समय जागरूक रहना पड़ेगा. वे ऐसे व्यक्ति को चुने जो उनके सुख-दुःख में, उनके साथ रहा हो; और जो भविष्य में भी उनके हितों की रक्षा करने के लिए संघर्ष करने में पीछे न हटे चाहे चुनौती कितनी बड़ी ही क्यों न हो. मुझे इस बात का गर्व है कि मैं ऐसे कई छात्र-नेताओं को जानता हूँ; उनके साथ मुझे काम करने के अवसर भी समय समय पर मिलते रहे हैं. लेकिन ऐसे नेताओं को मुझसे कहीं बहतर वर्तमान में छात्र जीवन के संघर्ष से गुज़र रहे युवा, जानते हैं.

ये चुनाव महज़ एक तमाशा न बन जाए, इसका विशेष ध्यान रखना होगा.

गांधी बनाम जिन्नाह
अंत में, मैं आपका ध्यान छात्र राजनीति की दो प्रमुख विचारधाराओं की ओर आकर्षित करना चाहूंगा: स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान जब राष्ट्रपिता, महात्मा गाँधी, ने छात्रों को अपनी-अपनी पढ़ाई छोड़कर, भारत छोड़ो आन्दोलन में पूरी तरह से भाग लेने का आह्वान किया था, तब उनके विरोधी और भविष्य के पकिस्तान के क़ैद-ए-आज़म, मोहम्मद अली जिन्नाह, ने यह टिप्पणी करी थी कि छात्र पहले अपनी पढ़ाई ख़त्म करके अपने-अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ, फिर किसी आन्दोलन में भाग लें.

मैं समझता हूँ कि इन दोनों के बीच का रास्ता, सही रास्ता है- जिसे बौद्ध-चिंतन में "मध्यम मार्ग" की संज्ञा दी गई है. छात्रों को आन्दोलन करना चाहिए, लेकिन जो भी आन्दोलन वे करें, उनके अपने छात्र-जीवन- विशेषकर पढ़ाई- से सीधे सम्बंधित रहे. मसलन उनका कॉलेज फीस में वृद्धी के खिलाफ आन्दोलन करना सही है, लेकिन धान ख़रीदी में हुए प्रदेशव्यापी घोटाले की जांच की मांग करने के लिए उनका अपनी क्लास छोड़कर जेल जाना, या फिर मुख्यमंत्री के पुतले जलाना, मेरी समझ से उचित नहीं होगा. ये काम युवा कांग्रेस, और कांग्रेस के दुसरे मोर्चा संगठनों, का है, न कि छात्रों का.

छात्र राजनीति- और उसके जरिए, प्रदेश की भविष्य की राजनीति- में जो परिवर्तन का प्रयोग प्रारंभ हुआ है, उसका मैं स्वागत करता हूँ. और सभी मेरे छात्र-छात्रा नौजवान साथियों को इस प्रयोग की अपार सफलता के लिए अपनी शुभकामना देता हूँ.

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Saturday, August 08, 2009

On An Advocate's First Birthday




Papa's poem for me: 12:34:56, 7.8.9

१२:३४:५६| ७|८|९

इस जन्मदिन पर विशेष

स्वाभिमान व संघर्ष के पंख लगाकर
सघन काले मेघों को चीरकर
उकाब बन, उड़ जा पुत्र.

महत्वकान्शाओं का नाम तेरा ही है
अविरल, अहर्निश
उड़ता चल, बढ़ता चल.

अपनी तन्मयता की छवि
अपनी एकाग्रता का हठ
अब देख रहा हूँ तुझमे, हर पल

साहस है कहाँ मंजिल में
जो दूर जा सके तुझसे
मिलेगी अवश्य, मिलेगी शीघ्र.


-पापा.
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Sunday, March 08, 2009

A Blog's Life.एक ब्लॉग की ज़िन्दगी

BIRTH PANGS (2006-07) जन्म यातनाएं

May 26 2006:
The first post of this blog, containing excerpts from my Jail Diary, The Ballad of Raipur Gaol, is published exactly twenty-six days after I am released on bail. The blog is christened Undertrial.

इस ब्लॉग की पहली पोस्ट, जिसमें मेरी जेल डायरी, "द बैलड ऑफ़ रायपुर जेल" (रायपुर जेल का गाथागीत), के कुछ अंश हैं, का मेरे जमानत पर रिहा होने के ठीक छब्बीस दिन बाद प्रकाशन होता है. ब्लॉग का नामकरण "अन्डरत्रायल" (विचाराधीन) किया जाता है.

November 2 2006:
Hindi makes its first appearance on this blog albeit in a fairly rudimentary form: Hindi posts such as this one are painstakingly composed on Adobe, then converted and published as .jpg images. The outcome is simply not worth the effort as readers have to click on each image to enlarge it in order to make the text readable.

हिंदी की इब्तदा ब्लॉग पर होती है, यद्यपि बेहद मौलिक रूप में: अडोब पर लिखे पोस्ट को .jpg में परिवर्तित करके प्रकाशित किया जाता है; पाठकों को अक्षरों को पढ़ने के लिए अलग-अलग चित्रों पर बार-बार क्लिक करना पड़ता है, जैसे कि इस पोस्ट में. इसलिए महनत के अनुसार फल नहीं मिल पाता.


January 12 2007:
A video of me delivering my first Chhattisgarhi speech is posted. This is the first Chhattisgarhi video on the internet of its kind.

मेरे छत्तीसगढ़ी बोली में दिए गए पहले भाषण के वीडियो को पोस्ट किया जाता है. अपनी तरह का यह इन्टरनेट पर पहला छत्तीसगढ़ी वीडियो है.


April 31-May 1 2007:
During my month-long incarceration, Dr. Saibel Farishta posts on this blog under the nom de plume, Tiger. This is the only time when this blog has two authors. Shortly after my acquittal, the "Tiger Posts" are lost forever when Saibel accidentally (?) deletes them.

इस एक महने जब मैं अचानक फिर जेल में रहा, तब डॉक्टर सैबल फ़रिश्ता इस ब्लॉग पर "टायगर" के नाम से पोस्ट करना जारी रखते हैं. केवल यही समय है जब ब्लॉग के दो लेखक रहते हैं. मेरे बरी होने के कुछ ही समय बाद, सभी "टायगर पोस्ट" हमेशा-हमेशा के लिए तब नष्ट हो जाते है जब सैबल उन्हें गलती से (?) मिटा देते हैं.

October 1 2007:
The first full Hindi post is published using Google Transliterate. The occasion is Mahatma Gandhi's birth anniversary.

सम्पूर्ण रूप से हिंदी की पोस्ट का पहला प्रकाशन होता है, गूगल Transliterate के कारण. अवसर गाँधी जयंती का है.

FIRST RENAISSANCE (2007-08) पहला पुनर्जन्म

December 2 2007:
After my acquittal in May 2007, the title of this blog, Undertrial, loses its meaning. Consequently, the blog is renamed ½FREEDOMS! After a month-long readers-poll, it is given a new look to make room for a variety of new gizmos, which had begun to clutter the lone sidebar: the standard two-column template is replaced with a three-column template by tweaking with Blogger's HTML code. Also, the main color scheme is changed from white-on-black to black-on-white to make the often-lengthy text less stressful to the eyes; and instead of complete texts of each post appearing on the main page, only excerpts are posted with a friendly 'Read More' link.

मई २००७ में मेरे बरी होने के बाद इस ब्लॉग का शीर्षक अपना अर्थ खो बैठता है. "विचाराधीन" की जगह अब इसका नाम "आधी आज़ादियाँ" कर दिया जाता है; साथ ही इसे नई शक्ल भी दी जाती है: नए-नए उपकरणों के लिए जगह बनाने के लिए ब्लोगर के टेम्पलेट के साथ छेड़खानी करके एक के बजाय दो साइडबार निर्मित किये जातें हैं; काले पर सफ़ेद की जगह सफ़ेद पर काले कलर स्कीम को रखा जाता है, ताकि लम्बे पोस्ट पढ़ते हुए पाठकों की आँखों पर जोर न पड़े; और मुख्य पन्ने पर "आगे और पढ़ें" लिंक के साथ केवल पोस्ट के कुछ अंश न की पूरे पोस्ट प्रस्तुत किये जाते हैं.

July 16 2007:
A Disclaimer is posted at the end of the main page. Among other things, it announces this blog's re-commitment to continue with its zero-censorship policy; and forbids publication of its contents without the author's prior consent. The latter part, as is evident from this and other posts, is rarely respected.

ब्लॉग नीति की सूचना ब्लॉग पर मुख्य पृष्ट के अंत में दी जाती है: इसमें ब्लॉग में शुरू से चली आ रही जीरो सेंसरशिप नीति को औपचारिक रूप से घोषित किया जाता है, साथ ही बिना लेखक की पूर्व अनुमति के इसके अंशों के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध भी लगाया जाता है. हालांकि इस दुसरे पहलू का कोई गंभीरता से पालन नहीं करता, जैसा कि इस पोस्ट से स्पष्ट हो जाता है.




SECOND RENAISSANCE (2009) दूसरा पुनर्जन्म

January 21 2009:
A separate Hindi blog on the politics of Chhattisgarh, छ्त्तीसगढ़िया सबले बढ़िया!, is started.

छत्तीसगढ़ की राजनीति पर हिंदी में एक अलग ब्लॉग, छ्त्तीसगढ़िया सबले बढ़िया!, की स्थापना होती है.


February 13 2009:
Following an Indian Express feature on this blog, in which it was mistakenly referred to as ½FREEDOM!, the name of the blog is changed for a second time to correspond to that error. The 's' is dropped from its name. The reason: although there are several kinds of freedoms, I realize that both its presence and absence are experienced as a unified whole.

इंडियन एक्सप्रेस में इस ब्लॉग के बारे में एक खबर, जिसमें इसका नाम गलती से आधी आज़ादी लिख दिया जाता है, के प्रकाशन के बाद उस गलती को ठीक साबित करने के लिए इसका दूसरा नामकरण होता है: 'याँ' को हटा दिया जाता है. कारण: हालांकि आज़ादी के कई प्रकार होते हैं, पर जब उसे और उसके अभाव, दोनों को महसूस किया जाता है, तो मुझे अहसास हुआ की वो सब एक ही लगते हैं.


March 1 2009:
Google's Friends Connect feature is added, making it possible for me to keep in touch with my friends- and critics- over this blog.

गूगल के फ्रेंड्स कनेक्ट उपकरण का ब्लॉग पर आगमन होता है, इस उम्मीद के साथ कि सखा और समालोचक, दोनों अब ब्लॉग के जरिए मेरे, और एक दुसरे के भी, संपर्क में बने रहेंगे.

March 5 2009:
½FREEDOM! finally makes its second rebirth with a new minimalist look. Only the bare essentials are retained in the two sidebars; the rest of the features appear as links in the header. Also, it becomes more Hindi-friendly.

ब्लॉग के दुसरे पुनर्जन्म की कड़ी समाप्त होती है, एक न्यूनतम शक्ल के साथ. सिर्फ बेहद जरूरी उपकरणों को ही साइडबार में बकाया रखा जाता है; बाकी सब हेडर में लिंक के रूप में दिखाई देते हैं. साथ ही, इसे और अधिक हिन्दी के अनुकूल बनाया जाता है.


(हिंदी में अनुवादित ये संक्षिप्त इतिहास इस बात का गवाह है!)
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Friday, February 27, 2009

Obituary: लखीराम अग्रवाल- एक श्रद्धांजली

I am, as always, thankful to Mr. Shailesh Nitin Trivedi- or as he now refers to himself "Mr. Shoogle" (to contrast himself from Google Translator)- for helping me with the translation. The English version of this post can be read here.

इस पोस्ट को अब आप मेरे हिंदी में लिखा छत्तीसगढ़ की राजनीति पर ब्लॉग,

छ्त्तीसगढ़िया सबले बढ़िया!, में भी पढ़ सकते हैं.



एक युग का शांतिपूर्ण समापन
मैं अक्सर यह सोचता हूँ कि क्या छत्तीसगढ़ के शासक दल के भीष्म-पितामह, लखीराम अग्रवाल, अपनी मृत्यु के समय संतुष्ट थे? लगभग दो बरस पहले, सन् २००७ में, जब मैं उनसे मिलने उनके खरसिया निवास पर गया था, तब वे खुश तो नहीं थे. मैं मानता हूँ कि इस नाखुशी का कुछ हिस्सा उस समय हाल ही में उनके पुत्र, अमर अग्रवाल, को राज्य मंत्रिमंडल से हटाये जाने से सम्बंधित था. (ऐसा लगता है कि इस मामले में उनसे विचार विमर्श नहीं किया गया था.) लेकिन इस नाखुशी का ज्यादा बड़ा कारण न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि समूचे भारत में
भाजपा का कांग्रेसीकरण हो जाना था. आखिरकार, समकालीन संघ साहित्य में इस बात की दुहाई बार बार पढ़ने को मिलती है. इस वाक्यांश का लाल कृष्ण अडवानी की आत्मकथा और आर.एस.एस. के मासिक मुखपत्र "पांचजन्य" (Organiser) के सम्पादकीयों में उपयोग बढ़ता ही जा रहा है.

उस मुलाकात में हम अकेले नहीं थे. इसके पहले सन् २००३ में जब मैं उनसे मिला था, तब चर्चा के विषय का अनुमान लगाने में प्रेस ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी. इस से हम दोनों को बेहद शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था क्योंकि उस नितांत अनौपचारिक बातचीत में राजनैतिक जोड़तोड़ की चर्चा कहीं थी ही नहीं. इसलिए इस बार मैंने इस मुलाकात में उपस्थित रहने के लिए प्रेस को आमंत्रित कर लिया था. बिना लागलपेट के हुई हमारी बातचीत में उन्होंने राज्य सरकार के कुछ नेताओं को
'औरंगजेब' की उपाधि देकर खलबली मचा दी थी. (यहाँ, उन्होंने बड़ी आसानी से हिन्दू समाज के पितृहंताओं के उदाहरणों की अनदेखी कर दी थी.) सर्वाधिक विस्मयजनक तो यह रहा कि किसी ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं लिखकर मेरे इस विश्वास को और दृड़ बना दिया कि यदि दोगुलेपन और अनावश्यक गोपनीयता के बजाय कूटनीति खुलेपन और स्पष्टवादिता के साथ की जाए तो वह उनती बुरी नहीं है. उस समय कांग्रेस की कोटा उपचुनाव में जीत के बाद वे भाजपा के सत्ता में वापसी को लेकर आश्वस्त नहीं थे. इसके लिए वे युवाओं में बुजुर्गों के प्रति सम्मान की कमी को सीधे-सीधे जिम्मेदार मानते थे. इसके मतलब को समझ पाना ज्यादा कठिन नहीं था.

मेरे पिता जी अक्सर मुझसे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में जनसंघ-भाजपा की इमारत को खड़े करने का श्रेय पूरी तरह से श्री अग्रवाल और उनके लम्बे समय के सहयोगी रहे कुशाभाऊ ठाकरे को जाता है. इन दोनों ने उस युग की कांग्रेस की अजेय मशीनरी की पूरी शक्ति के खिलाफ काम करते हुए, हर संभव कठिनाइयों से जूझते हुए, नए रंगरूटों की तलाश में राजमाता ग्वालियर द्वारा दी गयी एक टूटी-फूटी खटारा जीप में अविभाजित मध्य प्रदेश के सुदूर अंचलों का दौरा करके, वर्त्तमान सत्ताधारी दल की नींव रखी. प्रश्न अब यह उठता है कि क्या उनकी पार्टी ने उन्हें अंततः छोड़ दिया था?

ऐसा लगा कि वे ऐसा ही सोचते थे. लेकिन यह अलगाव व्यक्तिगत से कहीं अधिक सैद्धांतिक था. अपने अन्य दक्षिणपंथी समकालीन सहयोगियों की ही तरह उन्होंने कांग्रेस के तथाकथित वंशवाद से ग्रस्त गलते हुए और उनके अनुसार अंततः निरर्थक ढांचे के विकल्प के निर्माण के ध्येय से अपनी लम्बी कष्टपूर्ण जीवन यात्रा शुरू की थी. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. लेकिन बेहद विडम्बना पूर्ण. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जो विकल्प सत्ता में आया, वह उसी संस्कृति का एक दूसरा स्वरुप है, जिसे बदलने के लिए उन्होंने ता-उम्र जद्दो-जहद की थी.

सत्ता की प्रवृत्ति के तीन उदाहरण
इस सन्दर्भ में चैरमैन माव की क्रांति पर प्रोफेसर तान चुंग के ञानविषयक मूल्यांकन का ख़याल आता है. क्रांति के पहले और क्रांति के बाद की चीन की राजनीति की संरचना का विश्लेषण करते हुए उन्होंने पाया कि नवनिर्मित पोलितब्यूरो के सदस्य करीब-करीब उन्ही घरानों से थे जिन्होनें पूर्वर्ती मांचू सम्राटों को शासनाधिकारी दिए थे.

और पास में देखे तो मुझे याद है कि मेरे पिता जी के एक मित्र ने
रायपुर में आयोजित विभिन्न मुख्यमंत्रियों के स्वागत समारोहों के कुछ फोटो देखाए थे. पहली नज़र में उन पीले पड़ चुके चित्रों में कुछ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय नहीं था. गौर करने पर मुझे पता लगा कि सभी चित्रों में केवल मुख्यमंत्री का चेहरा बदला है, उनके आसपास ऊर्जावान याचना की विभिन्न मुद्राओं में तैनात लोग और उनकी भावभंगिमाएं सभी फोटो में बिलकुल एक जैसे हैं. लगभग दो दशकों के अंतराल में लिए गए विभिन्न चित्रों को देखकर ऐसा लगा जैसे शाश्वत और निरंतर स्वागतकर्ताओं के इस ऐतिहासिक समूह ने किसी जादू के बल पर समय के साथ-साथ आयु को ययाति की तरह जीत लिया है.

इस चिरयुवा प्रजाति के बचाव में मैं हरयाणा के एक पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे के द्वारा मुझे सुनाया गया एक छोटा सा वाकया प्रस्तुत करना चाहता हूँ. पहली बार कार्यभार ग्रहण करने के बाद जब उनके पिता सुबह सैर पर निकले, तो उनके साथ एक ऐसा आदमी लग लिया जो उनसे भी पहले यह जान जाता था कि वे क्या चाहते हैं. स्वाभाविक रूप से समय के साथ-साथ यह साथ गहरी दोस्ती में बदल गया. उनके शब्दों में ही कहें तो वे लोग दो जिस्म एक जान हो गए थे. फिर जब वे सत्ता से हटे, तो इस आदमी का कहीं अता-पता ही नहीं चला. सालों बाद वे फिर से सत्ता में लौटे. और फिर सुबह की सैर के समय उन्होंने उसी व्यक्ति को अपने साथ पाया. पीड़ा और विस्मय के साथ उन्होंने उससे पूछा कि "मैं सोचता था कि हम लोग बहुत अच्छे मित्र थे. इतने साल तुम कहाँ चले गए थे?"

बेहद भोलेपन से उस व्यक्ति ने कहा:
"चला गया था? चले तो आप गए थे, हुज़ूर. मैं तो यहीं था."

असहज मुखिया
उपरोक्त तीनों उदाहरण सत्ता की वास्तविक प्रकृति पर रौशनी डालते हैं. संक्षेप में कहें तो सत्ता में ऐसी ईश्वरीय-क्षमता है कि किसी को भी अपनी छवी में ढ़ाल लेती है. सत्ता में आने के बाद भाजपा प्रलोभनों के मंत्रमुग्ध कर देने वाले इस सम्मोहन से नहीं बच सकी. उदाहरण स्वरुप, कई मायनो में स्वर्गीय प्रमोद महाजन का किसी भी अन्य जीवित कांग्रेसी से अधिक कांग्रेसीकरण हो गया था. कांग्रेसी सत्ता में बने रहने को एक कला मानते हैं; लेकिन श्री महाजन ने उसे एक अत्याधुनिक विज्ञान में तब्दील कर दिया, और इस प्रक्रिया में देश में राजनीति करने के तौर-तरीकों को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया. (छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता में वापसी का श्रेय इस बदलाव को ही जाता है.)

श्री अग्रवाल ने इस बदलाव की आहट को भली-भाँती समझ लिया था. सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इसका अर्थ पुराने नेताओं के साथ-साथ आर.एस.एस. के सरसंघचालकों, केशव हेडगेवार और माधव गोलवलकर, के पुराने विचारों और कार्यपद्धति को हाल ही में बनी भाजपा की राज्य सरकारों के मंत्रियों द्वारा दरकिनार किया जाना था, जिसे समकालीन राजनैतिक समीक्षक भाजपा और संघ के बीच बढ़ती दूरियों की संज्ञा देतें हैं. आखिर, लखीराम जी कैसे भूल सकते थे कि उनका स्वयं का बेटा भी एक मंत्री है?

विशेष रूप से यह आखिरी पहलू उन्हें परेशान करता था. एक बार उन्होंने मुझे बताया कि जब भी पार्टी की बैठकों में संभावित उम्मीदवार के रूप में उनके बेटे के नाम पर विचार किया जाता था, तो वे चुपचाप उस कमरे से बहार निकल जाते थे ताकि निर्णय पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े. उनका मानना था कि अगर उनके बेटे को पार्टी कि टिकिट दी जाती है, तो उसकी योग्यता के कारण न कि खून के रिश्ते के कारण. स्पष्ट रूप से वे वंशवादी होने के आरोपों से बचना चाहते थे. आखिरकार, उनके लिए सारी ज़िन्दगी के परिश्रम का अर्थ अपने वंश के अभ्युदय से कहीं बहुत अधिक था. मानो वो घोषणा करना चाहते थे कि
"कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने सब कुछ अपने बेटों के लिए किया."

गैर-वंशवादी
मेरे दृष्टिकोण में इस सम्बन्ध में उनकी आशंकाएं पूरी तरह से बेबुनियाद थीं. वास्तव में उनके केवल एक बेटे ने राजनीति में प्रवेश किया और एक ऐसे क्षेत्र से लगातार जीत हासिल की जहाँ उनके पिता का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं था; एक ऐसा क्षेत्र जो पहले कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. बाकी बेटे परिवार के गुडाखू व्यवसाय में लगे रहे. उनकी जीवन भर की महनत से यदि किसी परिवार को लाभ मिला तो वह उनका निजी परिवार नहीं बल्कि वह परिवार था जिसे आर.एस.एस. के विचारकों ने 'संघ परिवार' की संज्ञा दी है. संघ के लिए बेहद उपयोगी साबित हुई अपनी पुस्तक "हम और हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा" (We or our Nationhood Defined) में श्री गोलवलकर ने लिखा है कि
"संघ समाज में संगठन नहीं, समाज का संगठन है."

श्री लखीराम को छत्तीसगढ़ में संघ परिवार के अविवादित मुखिया बने रहना का पूरा अधिकार था. आखिरकार, यदि उन्होंने यहाँ के दूरस्त अंचलों की यात्रा नहीं की होती-
जशपुर जाकर वहां के युवा राजकुमार, दिलीप सिंह जूदेव, को भाजपा से जुड़ने के लिए तैयार नहीं किया होता या कवर्धा जाकर वैसे ही एक और युवा आयुर्वेदिक चिकित्सक, डॉक्टर रमण सिंह, को आर.एस.एस. की शाखाओं में शामिल होने के लिए प्रेरित नहीं किया होता- तो भाजपा कभी सत्ता में नहीं आ पाती. लेकिन उनके यही चेले अपने गुरु के खिलाफ होते रहे.

मैंने पहली बार इसे तब महसूस किया जब सन् २००१ में १२ भाजपा विधायकों ने कांग्रेस में शामिल होने का फैसला लिया, जो कि भारतीय इतिहास में अपनी तरह का पहला और आखिरी उदाहरण है. सबसे ज्यादा चौकाने वाली बात तो यह थी कि उनमे से अधिकतर लोगों ने अपने दल-बदल का सबसे प्रमुख कारण जो बताया, वह केवल दो शब्दों का था: लखीराम अग्रवाल. उनकी शिकायत थी कि पार्टी के विधायक होने के बावजूद जब वे अपने गुरु के पाँव छूते थे, तब वे उनकी तरफ देखने की जरूरत भी नहीं समझते थे. इस से इन विधायकों को बेहद पीड़ा होती थी. जब मैंने 'लखी अंकल' को यह बताया, तो वे यह कहकर हंस दिए कि
"यदि ऐसा था तो उन्हें मेरे पाँव छूने की जरूरत नहीं थी."

जिसे लोगों ने बेपरवाह घमंड समझा, वह वाकई में एक स्वनिर्मित व्यक्ति का आत्म-सम्मान था. उनकी दुनिया में उन्हें किये जा रहे अभिवादनों का उत्तर देने या स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं थी. शायद वे इन अभिवादनों को आदर का एक ऐसा फर्जी प्रदर्शन मानते थे जो उनकी कृपा से राजनैतिक अस्तित्व में आये लोगों के द्वारा और ज्यादा लाभ लेने की कोशिश मात्र थी. उनके अनुमान से यदि वे लोग वाकई में स्वीकरोक्ति की अपेक्षा रखते थे, तो यह नितांत हास्यापद था.

मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूँ. यह अच्छी राजनीति भी नहीं है. मैं एक ऐसे परिवार से हूँ जिसका उपकार करने और उपकार लेने का एक लंबा इतिहास है. उपकार के बदले में आभार की अपेक्षा रखना- उसे अपना अधिकार समझना- अव्यावहारिकता का परिचायक है. वास्तविकता तो यह है कि अक्सर लोग उनको किये गए उपकार को इश्वर-प्रदत्त मानने लगते हैं; कभी-कभी वे उसे अपनी महनत का फल भी समझ लेते हैं. समकालीन मूल्यों को स्वीकार न करके श्री अग्रवाल अपने उस भोलेपन का सबूत दिया जो उनकी पीढ़ी के लोगों में असामान्य नहीं है. इस प्रक्रिया में उनके अपने कई चेलों से सम्बन्ध बिगड़ गए, जो आज सरकार और संगठन, दोनों में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं.

व्यक्तिगत-राजनीतिज्ञ
हम में से जिन लोगों को आगे लाने में उनका कोई योगदान नहीं था, या जिनपर उनके उपकार नहीं थे, उनके प्रति वे संकोच में डाल देने की सीमा तक विनम्र थे. राज्य सभा के मेरे पिता जी के लम्बे समय तक सहयोगी होने के बावजूद, उम्र में मुझसे लगभग आधी सदी बड़े होने के बावजूद, और हर मायने में मुझसे बेहतर होने के बावजूद, जब भी मैं उनसे मिलता था, वे मुझे बेहद आदर से
"अमित जी" कहकर पुकारते थे.

मैं मनाता हूँ की वे एक अच्छे समालोचक भी थे. एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि वे सोचते हैं कि संभवतः मेरे पिता जी मध्य प्रदेश के सुविख्यात मुख्यमंत्री और उनके सबसे पुराने राजनैतिक गुरु, अर्जुन सिंह, से भी बेहतर प्रशाषक थे. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि मेरे पिता जी को महान बनने से उनकी दूसरों से सलाह-मशविरा न करने की प्रवृत्ति ने रोका. मैं आज यह नहीं कह सकता कि मेरे पिता जी की कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में उनका यह दृष्टिकोण कितना सही था. लेकिन शायद श्री अग्रवाल के सुप्रसिद्ध प्रचार तंत्र से प्रभावित जनमानस की धारणा तो ये ही है. हालांकि इस सलाह की सदाशयता से कोई इनकार नहीं कर सकता है. आखिरकार, सलाह-मशविरा करना स्वयं में महत्त्व रखता है; उस से सहमती होना या न होना दीगर बात है.

किसी भी स्थिति में मैं इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ कि राज्य का कोई अन्य भाजपा नेता अपने किसी राजनैतिक प्रतिद्वंदी के बारे में इस तरह की टिपण्णी करे, और उसके बेटे को सत्ता में वापसी के लिए सकारात्मक सलाह देने की सीमा तक चला जाए. यह शायद इसलिए था क्योंकि श्री अग्रवाल मेरे पिता जी को सिर्फ एक ऐसा विरोधी नहीं मानते थे जिसे लड़कर नेस्तनाबूत कर देना है बल्कि मैं मानता हूँ कि वे मेरे पिता जी को एक साथी और एक मित्र की तरह समझते थे. क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का अधिकाँश हिस्सा संघर्षों में बिताया था, अतः वे सत्ता संघर्ष की उस उहापोह से दूर रहते थे जो
"सत्ता परमोधर्म" की नीति पर चलने वालों के अंतर्मन में उत्पन्न होने वाली निहायत ही अहमकाना असुरक्षा को जन्म देती है.

इसलिए उनकी दुनिया में
करो या मरो किस्म के सत्ता के कुटिल खेलों के लिए जगह नहीं थी. बल्कि जिन लोगों से वे सहमत नहीं रहते थे, उनसे भी परिचय और मेल-मुलाकात की गुंजाइश बनी रहती थी. उनके लिए राजनीति कभी व्यक्तिगत रंजिशों का रूप नहीं लेती थी. (उनसे कुछ कम लेकिन कुछ हद तक यह गुण उनके पुत्र को भी विरासत में मिला है.) इस से भी बड़कर वे व्यक्तिगत संबंधों को राजनीति से ऊपर रखते थे. उनकी बहु के अंतिम-संस्कार के समय पिछले बरस उन्होंने मुझसे कहा था कि उनके मित्र, श्री ठाकरे, के निधन के बाद पार्टी मीटिंग या अन्य किसी कारण से भी उनका दिल्ली जाने का मन नहीं होता है. उनकी पार्टी के नई दिल्ली के अशोक रोड स्थित राष्ट्रीय मुख्यालय में उन्हें अपने दिवंगत मित्र की बेहद याद आती है क्योंकि श्री ठाकरे ने संगठन के लिए समर्पित होकर वहां एक ब्रह्मचारी के रूप में एक ही कमरे में अपना अधिकाँश जीवन बिता दिया, शायद इसलिए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई दूसरा ठौर या कारण नहीं था.

यह कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के जीवन की सार्थकता का अनुमान उसके अंतिम-संस्कार में सम्मिलित लोगों से लगाया जा सकता है. श्री अग्रवाल एक अतूलनीय संगठक होने के अलावा न तो किसी पद में थे, न ही किसी विषय के विशेषज्ञ या शिक्षाशास्त्री या कोई बड़े कलाकार थे. इस के बावजूद उनकी पार्टी और उसके बाहर के भी, और वे भी जिन्हें राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, ऐसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के लोग, उनके प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए आये थे, जिनके जीवनों को अपने कार्यों से उन्होंने छुआ था, और जिन्हें उन्होंने राहत पहुंचाई थी. वे लोग मुख्य रूप से इसलिए आये थे क्योंकि वे उन्हें जानते थे और उनसे स्नेह करते थे, व्यक्तिगत रूप से.

दीर्घकालीन व्यक्तिगत संबंधों के लिए सैधांतिक या राजनैतिक रूप से एकमत होना अनिवार्य नहीं है.
राजनैतिक विरोधी भी अच्छे व्यक्तिगत मित्र हो सकते है. हमारी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों को श्री अग्रवाल द्वारा दी गयी यह सबसे महत्वपूर्ण सीख है. छत्तीसगढ़ के लिए यह उनकी सबसे स्थायी विरासत भी है.
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